मकरंद

अमित…“निश्छल”

  • क्रम विहीन ज़ज़्बात ✒️क्रम विहीन ज़ज़्बात उमड़ करउमड़-घुमड़ कर, पुनः उमड़ करआख़िर बहकर चित्त कलम सेकागज़ पर ही फैल गये हैं;या जाने, उनके सम्मानोंमें निशि में विचरण करते जोस्नेहयुक्त वे स्निग्ध वायु केझोंके भी अब गैर हुवे हैं। वैर हुई क्या? मीत बता देऐसी भी क्या बेमानी हैया, सागर के सीने में भीसुरक्षित नहीं जलज Read more

  • देवदूत बन आये हैं ✒️मिट्टी चमन अमन संदेशे जिस धरती ने देते आये,भगवन रूप बदल धरती पर देवदूत बन आये हैं। भगवन जिस मिट्टी पर पग धरसात सिंधु को पार करवामन भेष अवतरित होक्षीर सिंधु को क्षार कर अहम हीन राजा बलि केअतुलनीय श्रद्धा वर्धन कोजगमग-जगमग तारे जोड़ेजिस धरती के कण-कण को मेघ चूमकर उसी Read more

  • मानवता की हार ✒️विवश मनुज को तीर लगानेभोजन, वस्त्र, नीर पहुँचाने,भगवन रूप बदलकर आख़िरदेवदूत बन आए हैं;और निकम्मे से दिखते जोवीर, बंधु-बांधव सारे वोनाना प्रकार सहयोग बढ़ानेमुद्रा-द्रव्य भी लाये हैं। व्यथा बढ़ी है धरती परइक नहीं मनुज के जाति की,वक्त ज़रा सा भी हो साहिबकुछ बात कहो इक बात की;जीव-जंतु जो जंगल में थेरमे बसे Read more

  • कलम, अब छोड़ चिंता ✒️कलम, अब छोड़ चिंता, व्यर्थ की यह वेदना कैसी? मुरादें हैं बहुत, लेकिनपथिक अनजान थोड़ा हैनियति आलेख का पालनसतत इहलोक खेला है,विरासत, सादगी पाईसदा गुणगान उसके गुनअचेतन से मिली आभासुभाषित जाल उसके बुन; निविड़ में पाखियों के है, मधुप की गुंजना कैसी?कलम, अब छोड़ चिंता, व्यर्थ की यह वेदना कैसी? तमस, Read more

  • आहत ठुमके ✒️पनघट पर तेरे ठुमकों ने, मरघट से मुझे पुकारा है;कानों में छन से गूँज रही, यह अमर सुधा की प्याला है।बेसुध सा सोता रहा सदा, अब ही तो जा कर जागा हूँ;सौभाग्य प्राप्त हुआ मुझको, वैसे तो निरा अभागा हूँ।तेरे दर्शन करने आयी, यह रूह युगों की प्यासी है;कुदरत ने गोदी में रखकर, Read more

  • गुज़रा ज़माना ✒️बचपन का ज़माना गुज़र गयाबेसब्र मेरे आँसू न रुके;आँखों ने बगावत कर डालीसूखे अचकन भी भींग पड़े। कल तक का जीवन स्वप्न हुआकल तक की राहें छूट गईं;मेरे अधराधर पल्लव सेइक नज़्म की डाली टूट गई। कल तक जो अपनी सी ही थीवह दुनियादारी और हुई;बचपन की क्रीड़ा अविरल सीअब कठिन काल की Read more

  • बादल – १४ (आकुल बादल) ✒️टप टप टपक रहा है बादल, इक खाल लपेटे काली सी;मानो सूरज की गर्मी से, महसूस करे बदहाली सी।खर, भस्म पड़े अब खेतों में, अगली फसलों की बारी है;है दावानल भी तृप्त नहीं, दीन-मलिन कृषक दुखारी है।सज्जन बादल गहरा होता, पुनर्विचार ठहरकर करता;पर विधि, लेखों में जाने क्यों, खेती को Read more

  • सावन की गति ✒️【दुर्मिळ सवैया】 नवरंग समाँ अब तान चला, बरसात नया चुपके – चुपकेअबकी बरखा सखि हूक उठे, लहरे मन में चुपके – चुपके;डुबकी कहुँ लेत सुदेश उठे, जल, सावन में चुपके – चुपकेअभिनंदन में सिर डाल खड़ा, पिक वायस भी चुपके – चुपके। जलमग्न हुआ घर गाँव जहाँ, कुश नार उगें चुपके – Read more

  • चाँद की फ़सल (बालगीत) ✒️शीतें बोता रहा चाँद निशि, तारे खिल्ली उड़ा रहे थे;दिखा तर्जनी उस चंदा को, मर्यादाएँ झुठला रहे थे।बेचैनी थी नादानी थी, शैतानी भी उकसाती थी;टिमटिम तारों की आवाजें,चंदा को बस भटकाती थीं।बच्चों के मुँह भी क्या लगना, चंदा शीतों को बोता था;नील गगन में विचरण करके, श्वेत स्वप्न वह संजोता था।शीतों Read more

  • हँसता बादल (बाल-गीत) ✒️बैठा उड़नखटोले में है, चंदा देखे मोरउड़नखटोला हिला हवा से, बादल हँसता जोर।हँसो सब हा हा हा हा हा…हँसो सब हा हा हा हा हा,हँसो सब हा हा हा हा हा…हँसो सब हा हा हा हा हा। मोर खड़ा है शीश झुकाये, उसके सुंदर ठोरझूम-झूम के दादुर गाये, वन में चारों ओर।रूठा Read more

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