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तिल-तिलकर तिलांजलि करे वर्तिकाड्योढ़ियों के नयन अंजनों की तमा;मशालों को जलकर नहीं चैन हैलौ की उठती शिखाएँ बड़ी शूरमा। यह अकथ नेह की नव निशानी नहींस्नायुओं-तंतुओं की कहानी नहीं;प्रेम के मानकों को तजे प्रेम मेंसत्य है, तृष्ण-यौवन की रानी नहीं। यह निशानी मृदुलता की छवि ओढ़करसौम्यता-सौष्ठवों की परिधि तोड़कर;उनके नैनों से ढुलकर सरकती रहीऊष्म-कोमल कपोलों Read more
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अन्यत्र बसाऊँ कहाँ तुम्हें 🖋️अन्यत्र बसाऊँ कहाँ तुम्हें?प्रियतम, मेरा दिल सूना है;कल को फिर यही कहोगी तुममुझको धड़कन भी छूना है।।१।।घड़कन तक भी गर बात बनेकरता हूँ अंगीकार इसे;पर, सहमति के परिपत्रों परमैं तथ्य बनाऊँ कहो किसे??२।।वक्त, प्रमाणों के पहियों परचलता है नित डगमग-डगमग;आलंबहीन होते ही यहगिर जाता है डग में डगमग।।३।।अत्यंत जर्जरित नौका हैअतिहीन Read more
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कितनी वांछित है? ✒️युवा वर्ग जो हीर सर्ग है, मर्म निहित करता संसृति काअकुलाया है अलसाया है, मोह भरा है दुर्व्यसनों कापिता-पौत्र में भेद नहीं है, नैतिकता ना ही कुदरत का;ऐसी बीहड़ कलि लीला में, आग्नेय मैं बाण चलाऊँकहो मुरारे ब्रह्म बाण की, महिमा तब कितनी वांछित है? जो भविष्य को पाने चल दे, वर्तमान Read more
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चुपके से कह दूँ ✒️Maleख़्वाबों में खिलते चंदा ओ, मेरे मितवा आचुपके से कह दूँ बातें कुछ कानों में फिर जाFemaleना ना मैं ना आऊँ बाबा, डर लगता है नाप्रेम पगा बेख़ुद आवारा किसने समझा? हाँMaleचल झूठी छोड़ो बातें ये, मैं देखा सपनाचंद्रप्रभा की छाँवों में लेटे हम दोनों हाँFemaleफिर बोलो मितवा मेरे, क्या बात Read more
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खाप की माप ✒️लगा बैठे बिना ही मन, सँभलते राह में साथीदिलों पर ज़ोर किसका है, कहो किसका कभी भी था?मगर ललकार सहने की, कभी सोची नहीं शायदयुगल को बाँध ठूँठों में, अनादर खाप का जो था। ज़मीं थी वासनाओं की, कमी कब यातनाओं की?कि निर्मम हाथ में चाबुक, दुसूती शर्ट था उसका;लगे थे काट Read more
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आरक्षण में जंगल ✒️आरक्षण उद्घोषित हुआ था, जंगल की परिपाटी में;बैठ माँद में शेर दुखी था, नंदन वन की घाटी में।आरक्षण अल्प दो मुझको भी, था बात सिंह भी बोला;छाती-फटी सभी जीवों की, हिरनी का बच्चा डोला।दद्दा तुम तो निपट अनाड़ी, गला फाड़ कर रोते हो?बली सदा के ठहरे तुम तो, आतंकित क्यों होते हो?जंगल Read more
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बादल-१५ (भादों का बादल) ✒️रूठे हो क्या बादल हमसे?भादों में नज़र न आते हो,खेतों में पड़ी दरारें हैंतुम अश्रु ना अब बरसाते हो;शुभचिंतक थे बस एक तुम्हींफिर कैसी यह लाचारी है,तेरी विरह वेदना में, घनझुलसी मेरी हर क्यारी है। ऐ भादों तुमसे अच्छा तोवह झर-झर झरता सावन था,आभासित हरी वादियों मेंजल-निर्झर वह मनभावन था;नीरसता इतनी Read more
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पागल पंछी ✒️भरी तिलिस्मी इस दुनिया में,कोई मुझको राह दिखाओ;समझ न पाता चमत्कार, हूँचीखो, हाहाकार मचाओ।इंद्रजाल में फँसकर पंछी,हाथ-पैर को मार रहा है;रह-रहकर अपने ही पर को,आघातों से काट रहा है।नहीं जानता रसिक जीव यह,अपने पंखों को काटे है;निकला भी गर इंद्रजाल से,बिन पंख नहीं उड़ पाते हैं।विलय लिखा हो जब जीवन का,कोई जादू, ना Read more
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शब्द किसानी ✒️मैं शब्द किसानी करता हूँ, कहो किसी से भी क्या डरना?भावों से सिंचित करता हूँ, जिसमें अपना सा इक झरनाना साहित्यिक ज़मींदार हूँ, खेती कितनी? बस है रोड़ीबोता हूँ उनमें शब्दों को, नियमित ही मैं थोड़ी-थोड़ी;श्रम उसमें मिल जाने से फिर, मिट्टी उर्वर सी हो जातीथोड़ी सी खेती से इसकी, उपज कोस-कोसों तक Read more
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संस्तुत मेघराज ✒️सरिता का गुण, विचरण करनाऊपर ना जल को जाना है,‘ऋतु वसंत में पतझड़ आया’यह कहना मात्र बहाना है।धारण करते, छत्र को संप्रभुदेव इंद्र क्यों सकुचाते हो?मधुर फुहारों से सावन केकहो देव क्यों उकताते हो?पूछूँगा, क्यों बरखा-बिजलीइस साल हुई बेगानी है?या फिर हठ करते बादल कीयह भी कोई शैतानी है? त्राहि-त्राहिमम, देव त्राहि हेमर्यादा Read more
